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दर्द नशा है इस मदिरा का ,विगत स्मृतियाँ साकी हैं , पीड़ा में आनंद जिसे हो, आये मेरी मधुशाला

धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षित : मरा हुआ धर्म मारने वाले का नाश ,और रक्षित किया हुआ धर्म रक्षक की रक्षा करता है इसलिए धर्म का हनन कभी न करना ,इसलिए कि मरा हुआ धर्म कभी हमको न मार डाले। जो पुरुष धर्म का नाश करता है ,उसी का नाश धर्म कर देता है ,और जो धर्म की रक्षा करता है ,उसकी धर्म भी रक्षा करता है। इसलिए मारा हुआ धर्म कभी हमको न मार डाले इस भय से धर्म का हनन अर्थात  त्याग कभी न करना चाहिए। यत्र धर्मो ह्यधर्मेण सत्यं यत्रानृतेन च ।  हन्यते प्रेक्षमाणानां हतास्तत्र सभासदः ‘‘जिस सभा में अधर्म से धर्म, असत्य से सत्य, सब सभासदों के देखते हुए मारा जाता है, उस सभा में सब मृतक के समान हैं, जानों उनमें कोई भी नहीं जीता ।’’ महाभारत का  भीष्म पर्व -भरी सभा  में जिसमें नामचीन भीष्म पितामह ,धृतराष्ट्र ,आदिक------ पाँचों पांडव -----मौजूद थे धूर्त और ज़िद्दी मूढ़ -मति दुर्योधन और कर्ण के मातहत दुश्शासन द्रौपदी का चीरहरण करता है यह तो भला हो अपने कन्हैयाँ का वस्त्र अवतार बन के आ गए द्रौपदी की आर्त : पुकार सुनके -और दुश्शासन थक हार के गिर पड़ा  यत्र धर्मो ह्य...

Priyanka violated security protocol in UP ,says CRPF(Hindi )

mailbox@livehindustan.com Priyanka violated security protocol in UP ,says CRPF टाइम्स आफ इंडिया के पृष्ठ १० पर पसरी यह खबर एक बात का खुलासा ज़ोरदार तरीके से करती है ,मूढ़मति राहुल बाबा साहब और उनकी चहेती ती बहना वाड्रा ख्याति की प्रियंका जी मुहैया करवाई सुरक्षा व्यवस्था को ठेंगा दिखाने में माहिर हैं। ऊपर से तुर्रा यह,यही लोग एनएसजी सुरक्षा वापस लिए जाने पर ज़मीन आसमान एक कर  दिये थे। इन्हें देश की सुरक्षा व्यवस्था पर भरोसा कब रहा है भाई साहब मूढ़मति साहब तकरीबन ४०० मर्तबा २०१९ में विदेशों के फेरे लिए रहें हैं इनकी अपनी सिक्योरिटी रहती है इन्हें कब परवाह है देश द्वारा मुहैया करवाई गई सुरक्षा व्यवस्था पर सरकारी इंतज़ामात पर। खबरों में हर चंद बने रहना इनका शगल है। आजकल वैसे भी इस कुनबे के पास कोई कामधाम तो है नहीं इसलिए ये कोई न कोई सुर्रा छोड़े रहते है। सलाम करते हैं हम इनकी दिव्यता को इनका हर मामलात पर अपना नज़रिया है जो बिलकुल ज़रूरी नहीं है इस देश की  ऐथोस  से समाज -संस्कृति से मेल खाये। यह 'स्वयं घोषित - विशेष कुनबा' है जिसके खूंटे से कई काले कोट वाले नामचीन लोग बंधे ...

संसद बनी रखैल है ,इनकी खड़गे -सुरजे हो गए जैम। लीला -पुरुष खड़ा हतप्रभ है ,फिर भी करता इनसे प्रेम।

हिन्दू  न मुसलमान ,बस किसान और जवान , बने मेरे देश की पहचान , तब सच्चे अर्थों में भारत बने महान। .............................. राजनीति की नौटंकी चलती रहती है , कभी हंसाये कभी रुलाये , मौसम तो बदला करता है। सुख -दुःख दोनों संग चले हैं , जीवन कब ठहरा करता है। कर्म करो नहीं फल की चिंता , फल तो खुद मिलता रहता है। ................................................. जीत गए तो हम जीते हैं हार गए तो ईवीएम , बिलकुल शेष नहीं है शेम। देश सुरक्षा  गई भाड़ में राफेल बन गया इनका गेम, संविधान से खेले नित -उत नामचीन हुआ है नेम। कोर्ट के निर्णय को धकियाते ,  हो जाती जब  टै टै टैम। संसद बनी रखैल है ,इनकी  खड़गे -सुरजे हो गए जैम।  लीला -पुरुष खड़ा हतप्रभ है ,फिर भी करता इनसे प्रेम। प्रस्तुति :वीरुभाई (वीरेंद्र शर्मा )

पिज़्ज़ा -हट में ओवन से उठती हुई खशबूएं नथुनों को वैसे ही भर देतीं हैं जैसे कॉफी बीन्स की उड़ती हुई बू जो दिमाग तक खुद- ब-खुद पहुँच जाती है

हम हैं तुम्हारे तलब -दार हो जनाबे पिज़्ज़ा , हम को  तुमसे है प्यार  ओ ललकऊ  पिज्जा।  माहिरों के अध्ययन में पिज़्ज़ा को सबसे तलबी खाद्य माना गया है ,इसका चस्का लग जाता है ललक पैदा होने लगती है ललचाने लगता है लती कारक पिज़्ज़्ज़ा आखिर क्यों ?आइये सरसरी तौर पर ज़ायज़ा लेते हैं : इसमें मौजूद धुर (शीर्ष )अवयवों को देखिये -एक छोर पर इसमें वसा (चिकनाई ,फैट )है ,शक्कर (शुगर )है ,नमकीनियत  के लिए नमक है।यही तिकड़ी दिमागी कोशिकाओं के एक समान गुणधर्मा समूह -न्यूरानों को पुरुस्कृत करके तृप्ति का एहसास हम तक पहुंचाती है।  पिज़्ज़ा की ऊपरी तह का कुर -कुरापन ,चीज़ का नरम और चिपचिपा होना ,सॉस का लेसदार होना मिलकर इसे एक ख़ास सेवरि स्वाद और खुश्बूओं   से भर देते हैं। दिल और दिमाग दोनों को खुश मिज़ाज़ बना देता है यह स्वाद। उल्लेखित खाद्य तिकड़ी में चीज़ तो अपनी जगह  खुद ही तलब पैदा करने वाली शै है फिर इसका ब्रेड और सॉस संग  मेल इसे चस्के तक ललक तक ले आता है।  पिज़्ज़ा -हट में ओवन से  उठती हुई खशबूएं नथुनों को वैसे ही भर देतीं हैं जैसे कॉफी बीन्स की ...

Tackling climate change could save millions of lives, report says(HINDI )

कोई ऐसा अनहोना लक्ष्य नहीं है जिसे २१०० तक लागू न किया जा सके। इतना ही तो है के (वायुमंडलीय एवं भू - ) तापमानों का  पूर्व उद्योगिक युग में जितना स्तर था हमारा कार्बन आउटपुट उसके ऊपर तापमानों को २ सेल्सियस की वृद्धि से ऊपर न जाने दे।  पेरिस जलवायु सहमति (२०१५ )में उल्लेखित लक्ष्य यही था। इस लक्ष्य के करीब पहुँचने का मतलब है जीवश्म ईंधनों का विकल्प ,खपत में भूमंडलीय कमी फलतया वायुप्रदूषण में एक स्तर तक कमी लाना ,ताकि २०५० तक हर बरस दस लाख लोगों को मौत के मुंह में जाने से बचाया जा सके. घर के बाहर और भीतर का  वायु प्रदूषण  हर साल सत्तर लाख लोगों को मौत के मुंह में धकेल रहा है। दुखद और निराशा पूर्ण है अमरीका का गए साल २०१७ में पेरिस जलवायु समझौते से पल्ला झाड़ के अलग खड़े हो जाना।  २४ वीं आलमी बैठक इस लक्ष्य को कैसे हासिल किया जाए इसी मकसद से हो रही है जिसमें जलवायु विनियमन से ताल्लुक रखने वाले नियम और उनकी अनुपालना कैसी और कितनी हो रही है .COP 24 यानी चउबीसवाँ संयुक्त राष्ट्रसंघीय फ़्रेमवर्क (बुनियादी ढांचा सम्बन्धी )सम्मलेन (कन्वेंशन )इसी मकसद...